Category: class 12th

Solid state most important questions for board and jee exam-Part-1

Why do we study solid state chemistry? To obtain the knowledge on design and development of materials with pre-required properties based on understanding the structure of solids in its influence on physical-chemical properties, understanding of phase relations, chemical synthesis, reaction kinetics as well as characterisation methods. What is the fundamental concept in solid state chemistry? A solid is a material in the solid state. Solid state chemistry is the branch…

Electrostatic Potential and Capacitance In Hindi(स्थिरवैद्युत विभव तथा धारिता)

विभव के प्रकार(Types Of Potential) :
धनात्मक विभव : जब एकांक धन आवेश को अनंत से विद्युत क्षेत्र के किसी बिन्दु तक लाने में वैद्युत बल के विरुद्ध कार्य करना पड़े तो उस बिन्दु का विभव धनात्मक कहलाता है।

ऋणात्मक विभव : जब एकांक धन आवेश को अनंत से विद्युत क्षेत्र के किसी बिन्दु तक लाने में वैद्युत बल द्वारा कार्य किया जाता है तो उस बिन्दु का विभव ऋणात्मक कहलाता है।

Electrostatic Charge And Coulomb’s Law

Questions You Can Answer After Reading : What is Electrostatic? What is the meaning of Static? What is Charge? What are the types of charge? What is the basic unit of charge? What are the fundamental charged particles? How to charge an object? What is the quantization of charge? How to detect the presence of electric charge? What is Coulomb’s…

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प्रस्तावना(Introduction) :

आप सब ने कभी न कभी पेन या कंघी को सूखे बालों पर रगड़कर छोटे छोटे कागजों को आकर्षित करने का खेल खेला ही होगा या कम से कम देखा तो जरूर होगा। तो इंसानी दिमाग की फितरत के अनुसार कभी न कभी आपने यह भी जरूर सोंचा होगा की ऐसा होता क्यों है? सामान्य कंघी या पेन मे आकर्षण का गुण क्यों नहीं होता है? आदि …..

एक दूसरी परिघटना भी जो हम सबने अनुभव किया है वो है ठंड के दिनों में कपड़ों का हमारे शरीर से चिपकना और साथ ही चिंगारी के साथ आवाज आना।

रात मे सोते समय कभी कंबल को रगड़ने पर चिंगारी का दृश्य होना ।

इन सबके पीछे स्थिर वैद्युत और इसके गुण ही कारण हैं।

वैद्युत आवेश(Electric Charges) : वैद्युतआवेश एक भौतिक राशि है जिसके कारण कोई पदार्थ विद्युत गुण प्रदर्शित करने लगता है।

  1. विद्युत आवेश एक अदिश राशि है
  2. इसका SI मात्रक कूलॉब है तथा संकेत C
  3. इसका विमीय सूत्र : [M0 L0 T A ] है
  4. आवेश दो प्रकार के होते हैं धन आवेश और ऋण आवेश

प्रयोगिक उदाहरण :

  1. काँच के छड़ को रेशम के कपड़े से रगड़ने पर काँच के छड़ में धनआवेश उत्पन्न होता है।
  2. एबोनाइट के छड़ को ऊनी कपड़े या बिल्ली के खाल से रगड़ने पर छड़ में उत्पन्न आवेश ऋण आवेश होता है।

आकर्षण/प्रतिकर्षण का नियम :

  1. सजातीय आवेश प्रतिकर्षित होते हैं
  2. विजातीय आवेश आकर्षित होते हैं

आवेश उत्पत्ति का इलेक्ट्रोनिक सिद्धान्त(Electronic Theory Of Origin Of Charge) :

  • प्रत्येक पदार्थ अणुओं(Molecules) से मिलकर बना होता है एवं प्रत्येक अणु परमाणुओं(Atoms) से मिलकर बना होता है।
  • परमाणु का समस्त भार उसके केंद्रीय भाग मे निहित होता है जिसे नाभिक(Nucleus) कहते हैं।
  • नाभि में दो प्रकार के कण होते हैं (i) प्रोटोन/Proton (ii) न्यूट्रोन/Neutron
  • प्रोटोन धन आवेशित कण होते हैं
  • न्यूट्रोन अनावेशित होते हैं
  • नाभि के चारों ओर इलेक्ट्रॉन विभिन्न कक्षाओं में चक्कर लगाते हैं।
  • इलेक्ट्रॉन/Electron ऋण आवेशित कण होते हैं।
  • इलेक्ट्रॉन व प्रोटोन के आवेश की मात्रा समान होती है
  • प्रत्येक परमाणु में इलेक्ट्रॉन व प्रोटोन की संख्या बराबर होती है।
  • अतः परमाणु दो विपरीत आवेशित कणों की उपस्थिती के बावजूद विद्युत रूप से उदासीन होती है।
  • बद्ध इलेक्ट्रॉन : जो इलेक्ट्रॉन नाभिक के निकट की कक्षाओं में भ्रमण करते हैं उन्हें बद्ध इलेक्ट्रॉन कहते हैं। ये नाभिक से दृढ़तापूर्वक बंधे होते हैं।
  • मुक्त/स्वतंत्र इलेक्ट्रॉन: बाह्य/अंतिम कक्षकों में उपस्थित इलेक्ट्रॉन पर आकर्षण का बल अत्यंत कम होता है अतः अति सूक्ष्म ऊर्जा पर भी वे आसानी से मुक्त हो सकते हैं। इन्हें मुक्त या स्वतंत्र इलेक्ट्रॉन कहते हैं। ये मुक्त इलेक्ट्रॉन ही किसी वस्तु/पदार्थ के आवेशित होने के लिए जिम्मेदार होते हैं।

घर्षण विद्युत :

  1. किसी पदार्थ को आवेशित करने के लिए इलेक्ट्रॉन या प्रोटोन का स्थानांतरण होना आवश्यक होता है।
  2. इलेक्ट्रॉन की अधिकता या प्रोटोन की हानी के कारण किसी वस्तु में ऋणात्मक आवेश उत्पन्न होता है।
  3. प्रोटोन की अधिकता या इलेक्ट्रॉन की हानी होने पर धनात्मक आवेश उत्पन्न होता है।
  4. रगड़ने पर जितना धन आवेश एक वस्तु में उत्पन्न होता है ठीक उसी मात्रा का ऋण आवेश दूसरे वस्तु में उत्पन्न होता है।

चालक तथा विद्युतरोधी :(Conductors And Insulators)

  1. चालक(Conductors): जो पदार्थ विद्युत को अपने से गुजरने देते हैं उन्हें चालक/सुचालक कहते हैं। सभी धातुएँ,मनुष्य आदि जन्तु, पृथ्वी आदि सुचालक के उदाहरण हैं।
  2. विद्युतरोधी(Insulators): जो पदार्थ विद्युत को अपने से गुजरने नहीं देते उन्हे विद्युतरोधी या कुचालक कहते हैं। सुखी लकड़ी, प्लास्टिक, रबर आदि कुचालक होते हैं।
  3. अर्धचालक(Semiconductors): वे पदार्थजिनकी चालकताचालक से कम परंतु कुचालक से अधिक होती है। सिलिकॉन और जर्मेनियम इसके मुखी उदाहरण हैं। इनकी चालकता तापमान के साथ बढ़ती है।

भूसंपर्कण(Earthing): किसी आवेशित पदार्थ को किसी चालक के द्वारा पृथ्वी से जोड़ देने पर उस आवेशित अदर्थ का आवेश पृथ्वी पर चला जाता है इस प्रक्रिया को भूसंपर्कण कहते हैं।विद्युत उपकरणों एवं परिपथों को भूसंपर्कण द्वारा संभावित नुकसान से बचाया जा सकता है।

प्रेरण द्वारा आवेशन(Charging By Induction) : जब किसीआवेशित पदार्थ को किसी दूसरे अनावेशित पदार्थ के नजदीक लाया जाता है तो अनावेशित पदार्थ का वह भाग जो आवेशित के तरफ होता है उसके विजातीय आवेशित कण एक तरफ हो जाते हैं और इस तरह दूसरा पदार्थ भी आवेशित हो जाता है इसे प्रेरण या स्थिर विद्युत प्रेरण कहा जाता है।

विद्युत आवेश के मूल गुण(Fundamental Properties of Electric Charge) :

  1. आवेश का संरक्षण: किसी वियुक्त निकाय का कुल आवेश संरक्षित रहता है।
  2. आवेश का क्वांटिकरण: सभी मुक्त आवेश परिमाण में आवेश की मूल इकाई e के पूर्ण गुणज होते हैं।
  3. आवेश का योज्यता: किसी भी पदार्थ मे उपस्थित कुल आवेश उसके विभिन्न भागों में उपस्थित समस्त आवेशों के बीजीय योग के बराबर होता है। q=q1+q2+q3……………

कूलॉंब का नियम (Coulomb’s Law):

बिंदु आवेश(Unit Charge) : बिंदु आवेश उन आवेशों को कहते हैं जिनका आकार उनके बीच की दूरी की तुलना में नगण्य होते हैं।

दो स्थिर बिंदु आवेशों के मध्य लाग्ने वाला बल उनके आवेशों के परिमाणों के गुणनफल के अनुक्रमानुपाती तथा उनके बीच की दूरी के वर्ग के व्युत्क्रमनुपाती होता है। यह बल उन आवेशों को मिलाने वाली रेखा के अनुदिश लगता है।

एकांक आवेश : यदि दो समान परिमाण वाले सजातीय आवेशों को निर्वात मेन 1 मीटर की दूरी पर स्थित कर दिया जाए तो वे एक दूसरे पर 9X109N का बल आरोपित करते हैं तो इनमें से प्रत्येक आवेश को एकांक आवेश कहा जाता है।

इस प्रकार एक कुलांब आवेश वह आवेश है जो अपने से 1 मीटर की दूरी पर रखे समान आवेश को 9X109N न्यूटन के बल से प्रतिकर्षित करता है। 

परावैधुतांक(Dielectric Constant):

  1. निर्वात या वायु मेन एक निश्चित दूरी पर रखे आवेशों के बीच लाग्ने वाले बल और किसी माध्यम में उन्हीं आवेशों को उतनी ही दूरी पर रखने पर उनके बीच लाग्ने वाले बल के अनुपात को उस माध्यम का परावैद्युतांक कहते हैं।
  2. इसे K से प्रदर्शित करते हैं।
  3. माध्यम की विद्युतशीलता Ɛ व निर्वात की विद्युतशीलता  Ɛ0के अनुपात को उस माध्यम के सापेक्ष विद्युतशीलता कहते हैं।
  4. K = Ɛ/ Ɛ0= Ɛr
  5. K = F1/F2
  6. वायु का परावैद्युतांक= 1.0000536
  7. प्रत्येक पदार्थ का परावैद्युतांक सदैव 1 से अधिक होती है कम नहीं।
  8. धातु का परावैद्युतांक अनंत होता है।

कूलांब के नियम की सीमाएं (Limitations of Coulom’s Law):

  1. यह नियम केवल बिन्दु आवेशों के लिए सत्य है
  2. केवल स्थिर आवेशों के लिए सत्य है
  3. यह अधिक दूरी पर रखे आवेशों के लिए लागू नहीं होता।

अध्यारोपण का सिद्धान्त(Superposition Theorem/Principle of Superposition) : इस सिद्धान्त के अनुसार कई बिन्दु आवेशों द्वारा एक अकेले बिन्दु आवेश पर आरोपित कुल बल अलग अलग बिन्दु आवेशों के द्वारा उस अकेले बिन्दु आवेश पर आरोपित बलों के सदिश योगफल के बराबर होता है।

निरंतर आवेश वितरण(Continuous Charge Distribution) :

  1. रैखिक आवेश वितरण(Linear Charge Distribution): प्रति एकांक लंबाई में उपस्थित आवेश की मात्रा को रैखिक आवेश घनत्व कहते हैं। इसे λ से दर्शाते हैं। λ=dq/dl
  2. पृष्ठ आवेश वितरण(Surface Charge Distrubution): प्रति एकांक क्षेत्रफल में उपस्थित आवेश की मात्रा को पृष्ठ आवेश घनत्व कहते हैं। इसे σ से दर्शाते हैं। σ=dq/ds
  3. आयतन आवेश वितरण(Volume Charge Distribution): प्रति एकांक आयतन में उपस्थित आवेश की मात्रा को आयतन आवेश घनत्व कहते हैं। इसे  ρ से दर्शाते हैं।ρ =dq/dV

स्थिर विद्युत बल और गुरुत्वाकर्षण बल की तुलना(Comparison Between Electrostatic Force and Gravitational Force) :

स्थिर वैद्युत बलगुरुत्वाकर्षण बल
समानता
बलों के व्युत्क्रम वर्ग के नियम का पालन करता है। निर्वात में भी लगता है यह एयक संरक्षी बल है अर्थात इसके द्वारा किया गया कार्य पथ पर निर्भर नहीं करता। यह एक केंद्रीय बल है
असमानता
बल आकर्षण या प्रतिकर्षण दोनों हो सकता है यह माध्यम पर निर्भर करता है प्रबल बल होता है। यह हमेशा आकर्षण का होता है यह माध्यम पर निर्भर नहीं करता यह बल दुर्बल होता है।

विद्युत क्षेत्र की अवधारणा(Concept Of Electric Field) :

किसी वैद्युत आवेश के चारों ओर का वह क्षेत्र जहां तक वह अन्य आवेश पर बल आरोपित कर सकता है, उस आवेश का विद्युत क्षेत्र कहलाता है।

किसी बिन्दु पर स्थित एकांक धन आवेश किसी आवेश के कारण जीतने बल का अनुभव करता है, उसे उस बिन्दु पर विद्युत क्षेत्र कहते हैं।

E=F/q0

मात्रक : न्यूटन प्रति कुलांब= N/C

विमीय सूत्र : [MLT-3A-1]

बिन्दु आवेश के कारण विद्युत क्षेत्र(Electric Field Due To Point Charge)

विद्युत क्षेत्र रेखाए(Electric Field Lines):

  1. विद्युत क्षेत्र में एकांक धन आवेश जिस पाठ पर गमन करता है उसे विद्युत क्षेत्र रेखा कहते हैं।
  2. यह एक काल्पनिक रेखा होता है।
  3. ये धन आवेश से प्रारम्भ होती है और ऋण आवेश पर समाप्त होती है।
  4. एकल धन आवेश की स्थिति में यह बिन्दु आवेश से प्रारम्भ होकर अनंत तक जाती है।
  5. एकल ऋण आवेश की स्थिति में यह अनंत से बिन्दु आवेश तक आती है।
  6. इनकी दिशाएँ वक्र के किसी बिन्दु पर खींची गयी स्पर्श रेखा के द्वारा बताई जाती है।
  7. दो क्षेत्र रेखाएँ एक दूसरे को कभी नहीं काटती। क्योंकि यदि दो क्षेत्र रेखाएँ एक दूसरे को काटती हैं तो प्रतिक्षेद बिन्दु पर दो स्पर्श रेखाएँ होंगी जो एक ही बिन्दु पर एक ही समय पर दो अलग अलग दिशाएँ प्रदर्शित करेंगी जो की संभव नहीं है।
  8. एकसमान विद्युत क्षेत्र : वह विद्युत क्षेत्र जिसके प्रत्येक बिन्दु पर विद्युत क्षेत्र नियत रहता है।

वैद्युत द्विध्रुव(Electric Dipole) :

अल्प दूरी पर स्थित दो समान परिमाण के विजातीय आवेशो के निकाय को विद्युत द्विध्रुव कहते हैं।

उदाहरण : N2 , H2

वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण(Electric Dipole Moment):

वैद्युत द्विध्रुव के किसी आवेश और द्विध्रुव लंबाई के गुणनफल को वैद्युत द्विध्रुव आघूर्ण कहते हैं। इसे p से दर्शाते हैं। यह एक सदिश राशि है। इसकी दिशा सदैव ऋणआवेश से धन आवेश के तरफ होती है। 

P=q x 2l

मात्रक : कुलांब मीटर (Cm)

वैद्युत द्विध्रुव के कारण वैद्युत क्षेत्र (Electric Field Due To Electric Dipole):

  • किसी विद्युत द्विध्रुव के कारण उत्पन्न विद्युत क्षेत्र को द्विध्रुव क्षेत्र कहते हैं।
  • किसी वैद्युत द्विध्रुव का कुल आवेश शून्य होता है मगर वैद्युत द्विध्रुव का क्षेत्र शून्य नहीं होता यह स्थिति पर निर्भर करती है :
  • पहला अक्षीय स्थिति और दूसरा निरक्षीय स्थिति

1.अनुदैर्ध्य स्थिति या अक्षीय स्थिति(Axial Position)

2.अनुप्रस्थ स्थिति या निरक्षीय स्थिति(Equitorial Position)

3 वैद्युत द्विध्रुव के कारण किसी बिन्दु पर विद्युत क्षेत्र(Electric Field At Any Point On The Dipole)

एकसमान वैद्युत क्षेत्र मे रखे वैद्युत द्विध्रुव पर बलयुग्म(Couple on an electric Dipole)

एकसमान विद्युत क्षेत्र मे वैद्युत द्विध्रुव को घुमाने मे किया गया कार्य

W=pE(1-cosθ)

एकसमान वैद्युत क्षेत्र मे वैद्युत द्विध्रुव की स्थितिज ऊर्जा

U=-pEcosθ

विशेष स्थिति :

  1. यदि θ=0 हो U=-pE (न्यूनतम)
  2. यदि θ=90 हो U=0
  3. यदि θ=180 हो U=+pE (अधिकतम) 

क्षेत्र सदिश :प्रत्येक पृष्ठ का क्षेत्रफलएक सदिश राशि होता है, इनकी दिशा हमेशा पृष्ठ के अभिलम्बवत बाहर की ओर होती है। इसे ΔS से प्रदर्शित करते हैं।

वैद्युत फ्लक्स की अवधारणा : विद्युत क्षेत्र में स्थित किसी पृष्ठ के अभिलम्बवत गुजरने वाली कुल क्षेत्र रेखाओं की संख्या को उस पृष्ठ से गुजरने वाला वैद्युत फ्लक्स कहते हैं।

गाउस प्रमेय(Gauss Theorem) :

किसी बंद पृष्ठ से गुजरने वाला सम्पूर्ण वैद्युत फ्लक्स उस बंद पृष्ठ के अंदर निर्वात में उपस्थित कुल आवेश का 1/ε0गुना होता है।

गाउस प्रमेय के अनुप्रयोग(Applications Of Gauss Theorem)

अनंत लंबाई के सीधे आवेशित तार के कारण वैद्युत क्षेत्र (Electric field due to infinitely long charged wire):

एकसमान आवेशित अनंत समतल चादर के कारण वैद्युत क्षेत्र( Electric field due to uniformly charged infinite plane sheet )

आवेश के दो अनंत समतल समांतर चादरों के कारण विद्युत क्षेत्र( Electric field due to two infinite plane parallel sheet of charge)

एकसमान आवेशित पतले गोलीय खोल(या कवच) के कारण वैद्युत क्षेत्र( Electric field due to uniformly charged thin spherical shell)

  • जब बिन्दु p गोलीय खोल के अंदर स्थित हो

E=0

Basic Concepts of Light in Hindi (प्रकाश: मूलभूत सिद्धान्त)

प्रकाश एक प्रकार की ऊर्जा है, जो हमारी आँखों को संवेदित करता है। प्रकाश स्रोत से निकलकर पहले वस्तु पर पड़ता है तथा इन वस्तुओं से लौटकर हमारी आँखों को संवेदित करके वस्तु की स्थिति का ज्ञान कराता है।जब प्रकाश किसी चिकने या चमकदार पृष्ठ पर पड़ता है तो इसक अधिकांश भाग विभिन्न दिशाओं में वापस लौट जाता है इस प्रकाश किसी पृष्ठ से टकराकर प्रकाश के वापस लौटने की घटना को प्रकाश का परावर्तन कहते हैं यदि पृष्ठ अपारदर्शक है तो इसका कुछ भाग अवशोषित हो जाता है यदि पारदर्शक है तो कुछ भाग पृष्ठ के पार निकल जाता है। चिकने व चमकदार पॉलिश किये सतह अधिकांश प्रकाश को परावर्तित कर देते हैं।प्रकाश का एक मध्यम से दूसरे मध्यम में प्रकाश करते समय, दूसरे माध्यम की सीमा पर अपने रेखीय पथ से विचलित होने की घटना का प्रकाश का अपवर्तन कहते है।जब कोई वस्तु दर्पण के सामने रखी जाती है तो वस्तु से चलने वाली प्रकाश किरणें दर्पण के तल से परावर्तित होकर दर्शक की आंखों पर पड़ती हैं जिससे दर्शक को वस्तु की आकृति दिखाई देती है इस आकृति को ही वस्तु का प्रतिबिम्ब कहते है।गोलीय दर्पण किसी खोखले गोले के गोलीय पृष्ठ होते हैं। यह दो प्रकार के होते हैं। उत्तल एवं अवतल दर्पण। उभरे हुए तल वाले जिसमें पॉलिश अन्दर की ओर की जाती है उत्तल दर्पण, तथा दूसरा जिसका तल दबा होता है पॉलिश बाहरी सतह पर होती है अवतल दर्पण कहते है।दो तलों से घिरा जिसके दोनों तल दो गोलों के पारदर्शक खण्ड होते हैं लेंस कहलाता है। इनका उपयोग सभी प्रकाशीय यन्त्रों जैसे : कैमरा, प्रोजेक्टर्स, टेलिस्कोप एवं सूक्ष्मदर्शी आदि में किया जाता है। ये काँच (मुख्यत:) या प्लास्टिक के बने होते हैं। ये दो प्रकार के होते हैं। उत्तल लेंस एवं अवतल लेंस।सूर्य का प्रकाश जब किसी प्रिज्म से गुजरता है तब अपवर्तन के कारण प्रिज्म के आधार की आरे झुकने के साथ साथ विभिन्न रंगों के प्रकाश में बँट जाता है। इस प्रकार प्राप्त रंगों के समूह को वर्णक्रम (Spectrum) कहते है। इन्द्र धनुष बनने का कारण परावर्तन , पूर्ण आंतरिक परावर्तन तथा अपवर्तन है। इन्द्रधनुष हमेशा सूर्य के विपरीत दिशा में दिखायी देती हैं और यह प्रात: पश्चिम में एवं सायंकाल पूर्व दिशा में ही दिखायी देती। है। जब सूर्य का प्रकाश वायुमण्डल से गुजरता है तो प्रकाश वायुमण्डल में उपस्थित कणों द्वारा विभिन्न दिशाओं में फैल जाता है, इसी प्रक्रिया को प्रकाश का प्रकीर्णन कहते है। शरीर का महत्वपूर्ण अंग एक कैमरे की तरह कार्य करता है। बाहरी भाग दश्ढपटल नामक कठोर अपारदर्शी झिल्ली से ढकी रहती है दश्ढपटल के पीछे उभरा हुआ भाग कार्निया कहलाता है।

What After Passing 12th?

For a student, class 12th is the threshold to the world of “Higher Education”. When a student is standing on this threshold he/she must know two things : First where to reach and second is how to reach? The goal must be crystal clear. So let’s know some path to your goals……
B. Tech/BE : Bachelor of Technology / Bachelor of Engineering.
JEE: Joint Entrance Examination – For admission in Indian Institutes of Technology(IITs) and National Institutes of Technology (NITs).
PET : Pre Engineering Test (State Level Entrance Examinations)
BITSAT : BITS Admission test.
VITEEE : VIT Engineering Entrance Exam .
WBJEE : West Bengal Joint Entrance Exam.
Integrated MTech
BCA :  Bachelor of Computer Applications
BArch : Bachelor of Architecture
BSc. : Bachelor of Science.

COVID-19 and Education

“we would be missing a great opportunity if our goal is to reopen our schools to look exactly like they did a year ago today, before the pandemic.” We have a unique opportunity to redesign our schools to fit the needs of the future. Let’s not reopen schools as if the last year never happened. Let’s leverage what we learned through the pandemic to make education permanently better for all.

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