Electrostatic Potential and Capacitance In Hindi(स्थिरवैद्युत विभव तथा धारिता)

प्रस्तावना (Introduction):

जब किसी आवेश विन्यास के कारण उत्पन्न विद्युत क्षेत्र में एक परीक्षण आवेश(Test Charge) को गति कराया जाता है तो उस पर कार्य करना पड़ता है। यह कार्य उस आवेश में स्थिर वैद्युत स्थितिज ऊर्जा के रूप में संचित हो जाता है।

किसी विद्युत क्षेत्र के किन्ही दो बिन्दुओं के बीच स्थिर वैद्युत स्थितिज ऊर्जा में अंतर परीक्षण आवेश को एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु तक ले जाने में बाह्य बल द्वारा किए गए न्यूनतम कार्य के बराबर होता है।

स्थिरवैद्युत विभव(Electrostatic Potential) :

एकांक धन आवेश को अनंत से विद्युतक्षेत्र के किसी बिन्दु तक लाने में किया गया कार्य उस बिन्दु का वैद्युत विभव कहलाता है। इसे V से प्रदर्शित करते हैं।

विभव के प्रकार(Types Of Potential) :

धनात्मक विभव : जब एकांक धन आवेश को अनंत से विद्युत क्षेत्र के किसी बिन्दु तक लाने में वैद्युत बल के विरुद्ध कार्य करना पड़े तो उस बिन्दु का विभव धनात्मक कहलाता है।

ऋणात्मक विभव : जब एकांक धन आवेश को अनंत से विद्युत क्षेत्र के किसी बिन्दु तक लाने में वैद्युत बल द्वारा कार्य किया जाता है तो उस बिन्दु का विभव ऋणात्मक कहलाता है।

विभवांतर(Potential difference) :

एकांक धन आवेश को विद्युत क्षेत्र में एक बिन्दु से दूसरे बिन्दु तक ले जाने में किया गया कार्य उन बिन्दुओं के बीच का विभवांतर कहलाता है।

स्थिरवैद्युत बल-संरक्षी बल : एकांक धन आवेश को स्थिर वैद्युत  क्षेत्र मे किसी बंद परिपथ में चलाने पर किया गया कार्य शून्य होता है। अतः स्थिर वैद्युत क्षेत्र संरक्षी होता है तथा स्थिर वैद्युत बल भी संरक्षी होता है।

इसे गणितीय भाषा में इस प्रकार लिखा जा सकता है :

अर्थात विद्युत क्षेत्र में बंद परिपथ में विद्युत क्षेत्र का रेखीय समाकलन सदैव शून्य रहता है।

बिन्दु आवेश के कारण किसी बिन्दु पर विभव (Electric potential at a point due to point charge):

वैद्युत द्विध्रुव के कारण किसी बिन्दु पर विभव(electric potential due to electric dipole) :

1.अक्षीय(अनुदैर्ध्य) स्थिति मे विभव(Potential at axial position) :

 

2. निरक्षीय (अनुप्रस्थ)स्थिति मे विभव (Potential at equatorial position)

V=0

3. किसी भी बिन्दु पर विभव(Potential at any point)

समविभव पृष्ठ(equipotential surface) :

वह पृष्ठ जिसके प्रत्येक बिन्दु पर वैभव समान होता है, समविभव पृष्ठ कहलाता है।

विद्युत क्षेत्र और विभवांतर मे सबंध(Relation between electric field and potential)

स्थिर वैद्युत स्थितिज ऊर्जा (Electrostatic potential energy):

वह कार्य जो आवेशों को अनंत से लाकर एक निकाय बनाने में किया गया हो उसे स्थिर वैद्युत स्थितिज ऊर्जा कहते हैं।

चालक-स्थिरवैद्युतिकी

  1. चालक मे स्वतंत्र एवं बध्द आवेश :
  2. धात्विक चालक मेन स्वतंत्र इलेक्ट्रॉन पर्याप्त संख्या में होते हैं। इन्हे मुक्त इलेक्ट्रॉन कहा जाता है।
  3. ये चालकों की सतह पर घूमते रहते हैं पर सतह से बाहर नहीं जा पाते।
  4. जब चालक को विद्युत क्षेत्र में रखा जाता है तब ये मुक्त इलेक्ट्रॉन विद्युत क्षेत्र के विपरीत दिशा में गति करने लगते हैं।
  5. परंतु डीएचएन आवेश जो नाभिक से बंधे होते हैं , गति नहीं कर पते इन्हें बद्ध इलेक्ट्रॉन कहा जाता है ।
  6. विद्युत क्षेत्र मे चालको का व्यवहार : यदि किसी बाह्य विद्युत क्षेत्र में किसी चालक को रख दिया जाए तो विद्युत क्षेत्र रेखाएँ रूपांतरित हो जाती हैं। क्षेत्र रेखाएँ पृष्ठ के लम्बवत उसमें प्रवेश करती है अथवा उसे छोडती हैं।
  7. चालक के अंदर स्थिरवैद्युत क्षेत्र शून्य होता है।
  8. आवेशित चालक के पृष्ठ के प्रत्येक बिन्दु पर स्थिरवैद्युत क्षेत्र पृष्ठ के अभिलम्बवत होता है
  9. किसी चालक के अंदर परिणामी आवेश शून्य होता है
  10. आवेशित चालक का सम्पूर्ण आवेश उसके पृष्ठ पर होता है
  11. किसी चालक के अंदर अथवा उसके पृष्ठ पर किन्ही दो बिन्दुओ के बीच कोई विभवांतर नहीं होता।
  12. आवेशित चालक के पृष्ठ पर विद्युत क्षेत्र निम्न सूत्र द्वारा प्रदर्शित किया जाता है

जहाँ  s = पृष्ठीय आवेश घनत्व है। 

चालक के पृष्ठ के भिन्न -भिन्न बिन्दुओ पर पृष्ठीय आवेश घनत्व भिन्न-भिन्न हो सकता है।

स्थिरवैद्युत आवरण या परिरक्षण(Shielding effect) :

किसी चालक के अंदर गुहिका को घेरे हुए गाउसीय पृष्ठ की कल्पना करने पर, गाउस प्रमेय से :     ΦE=q/ε0

किन्तु चालक के अंदर कोई आवेश नहीं होता, इसलिए : q=0

ΦE=0

गुहिकायुक्त चालक मे गुहिका के अंदर विद्युत क्षेत्र का समाप्त होना या अनुपस्थित होना स्थिर वैद्युत आवरण या परिरक्षण कहलाता है।

दैनिक जीवन में महत्व :

  1. विद्युत उपकरण को बचाने के लिए इसे खोखले चालक से ढँक देना चाहिए। इसके अंदर यंत्र सुरक्शित रहता है।
  2. कार से यात्रा के दौरान यदि बारिश और आँधी तूफान , बिजली का चमकना आदि हो तो कार से बाहर आने के स्थान पर कार की खिड़कियाँ बंद करके कार के अंदर ही इंतजार करना चाहिए, कार धात्विक चालक से बने होने के कारण संरक्षित होता है और इस तरह जानलेवा दुर्घटना से बचा जा सकता है।

परावैद्युत(Dielectrics) :

परावैद्युत विद्युतरोधी पदार्थ होते हैं। इनमें विद्युत वाहक नगण्य होते हैं। जब परावैद्युत को किसी विद्युत क्षेत्र में रखा जाता है तो वह विद्युत क्षेत्र के प्रभाव को कम कर देता है। इस प्रभाव की मात्रा पदार्थ के गुण पर निर्भर करता है।

किसी परावैद्युत पदार्थ में कुल विद्युत क्षेत्र कभी शून्य नहीं होता।

परावैद्युत पदार्थ के अंदर विद्युत क्षेत्र बाह्य विद्युत क्षेत्र से सदैव कम होता है।

परावैद्युत के प्रकार :

  1. ध्रुवीय परावैद्युत(Polar dielectrcs)
  2. अध्रुवीय परावैद्युत(nonplar dielectrics)

परावैद्युत ध्रुवण: जब परावैद्युत पदार्थ को किसी बाह्य विद्युत क्षेत्र मे रखा जाता है तब उसमें बाह्य विद्युत क्षेत्र की दिशा में द्विध्रुव आघूर्ण प्रेरित हो जाता है जिसका मान क्षेत्र की तीव्रता के अनुक्रमानुपाती होता है। इस क्रिया को ध्रुवण कहते हैं ।

परावैद्युत सामर्थ्य: विद्युत क्षेत्र का अधिकतम मान जिसे आरोपित करने पर परावैद्युत माध्यम से इलेक्ट्रॉन पृथक नहीं होते, परावैद्युत माध्यम की परावैद्युत सामर्थ्य कहलाता है।

धारिता शब्द से हम सब परिचित हैं, जैसा की हम सब जानते हैं किसी बर्तन की धारिता उसके धारण करने की क्षमता को कहते हैं। धारिता का मतलब धरण करने की क्षमता

जैसे किसी बर्तन में कोई द्रव डालने पर बर्तन में द्रव का स्टार धीरे धीरे बढ्ने लगता है उसी प्रकार किसी चालक को आवेश देने पर उसका विभव बढ्ने लगता है।

किसी चालक को दिया गया आवेश उसके विभव के अनुक्रमानुपाती होता है। किसी चालक को Q आवेश देने पर उसके विभव में V की वृद्धि होती है तो :

QµV _________(1)

Q=CV_________(2)

C=Q/V_________(3)

यदि V=1 हो तो C=Q

चालक की विद्युत धारिता आंकिक रूप से आवेश की उस मात्रा के बराबर होती है जो उसके विभव में एकांक वृद्धि कर दे।

किसी चालक की धारिता गणितीय रूप से उसमें उपस्थित आवेश की मात्रा एवं विभव के अनुपात के बराबर होती है। C=Q/V

मात्रक : विद्युत धारिता का SI मात्रक फैराड है, इसे F से प्रदर्शित करते हैं।

फैराड़ की परिभाषा : किसी चालक को 1 कुलांब का आवेश देने पर उसके विभव मे 1 वॉल्ट की वृद्धि हो जाए तो उसकी विद्युत धारिता 1 फैराड़ होती है।

गोलीय चालक की धारिता(Capacitance of spherical conductor) :

 

C-R ग्राफ :

संधारित्र(Capacitors) :

ऐसी युक्ति जिसकी सहायता सेकिसी चालक के आकार व आयतन बढ़ाए बिना उसकी विद्युत धारिता बढ़ायी जा सकती है।

सिद्धान्त : संधारित्र का कार्य करने का सिद्धान्त प्रेरण द्वारा आवेशण पर आधारित है।

जब एक आवेशित पृथक्कृत चालक के समीप अन्य अनावेशित चालक को लाया जाता है, तो आवेशित चालक की धारिता बढ़ जाती है। दो चालकों के इस निकाय को संधारित्र कहते हैं।

  • संधारित्र दो चालकों का समायोजन होता है जिनके मध्य परावैद्युत माध्यम जैसे वायु, काँच आदि भरे होते है।
  • दो चालकों को संधारित्र का प्लेट कहा जाता है।
  • प्रत्येक चालक को एक ऐसा संधारित्र माना जा सकता है जिसका दूसरा प्लेट अनंत पर होता है।
  • स्थिर धारिता वाले संधारित्र को  परिपथ में           से दर्शाया जाता है।
  • परिवर्ती धारिता वाले संधारित्र को                से दर्शाया जाता है। 
  • आवेशित संधारित्र के दोनों प्लेटों पर बराबर तथा विपरीत आवेश होते हैं।अतः संधारित्र पर कुल आवेश हमेशा शून्य होता है।
  • संधारित्रों का प्रमुख कार्य आवेशों या विद्युत ऊर्जा को संचित करना होता है ।

संधारित्र के प्रकार :

प्लेटों की आकृति के आधार पर संधारित्र मुखी रूप से तीन प्रकर के होते हैं:

  1. समांतर प्लेट संधारित्र
  2. गोलीय संधारित्र
  3. बेलनाकार संधारित्र

समांतर प्लेट संधारित्र(Parallel plate capacitor) :

धारिता पर परावैद्युत का प्रभाव(effect of dielectric on capacitance) :

संधारित्र के दोनों प्लेटों के बीच K परावैद्युतांक का माध्यम होने पर उसकी धारिता निर्वात की तुलना में K गुनी हो जाती है।

C=KC0

आंशिक रूप से परावैद्युत पदार्थ की उपस्थिती मे समांतर प्लेट संधारित्र की धारिता(capacitance of parallel plate capacitor partially filled with dielectric medium)

संधारित्रों का समायोजन(Combinations of capacitors):

संधारित्रों मे संचित ऊर्जा(Electrical potential energy stored in a capacitor)

आवेशों का पुनर्वितरण(redistribution of charges)

यदि A और B दो पृथक्कृत चालक गोले हैं और चालक का आवेश Q1, विभव V1, चालक B का आवेश Q2, विभव V2 है।

Q1=C1V1

Q2=C2V2

कुल आवेश Q=Q1+Q2

दोनों चालकों को एक तार से जोड़ने पर उभयनिष्ठ विभव

V=कुल आवेश/ कुल धारिता

V = (Q1+Q2) /(C1+C2)

V= (C1V1+C2V2)/(C1+C2)

आवेशों के पुनर्वितरण मे ऊर्जा हानि(energy loss in redistribution of charges)

नुकीले भागो की क्रिया(Corona Discharge/ Sharp point action)

नुकीले भाग की क्रिया अर्थात संवहन विसर्जन (Corona discharge) – यदि किसी धन आवेशित चालक का कोई सिरा नुकीला है, तो नुकीले सिरे पर आवेश का पृष्ठीय घनत्व (Surface density of charge) अधिक होता है इस स्थिति में नुकीले भाग से वैद्युत पवन उत्पन्न हो जाता है जिसमे धनावेश होता है।

वान डे ग्राफ जनित्र(Van de graff generator) :

प्रोफेसर वानडे ग्राफ ने सन् 1931 में एक ऐसे स्थिर वैद्युत उत्पादक यन्त्र (electrostatic generator) की रचना की जिसके द्वारा दस लाख वोल्ट या इससे भी उच्च कोटि का विभवान्तर उत्पन्न किया जा सकता है। इस जनित्र को उनके नाम पर ही वानडे ग्राफ जनित्र कहते हैं।यह नुकीले भागों की क्रिया के सिद्धान्त पर कार्य करता है।

सिद्धान्त(Principle)- 

इस जनित्र का सिद्धान्त निम्न दो स्थिर वैद्युत घटनाओं पर आधारित है- 

(i) एक खोखले चालक का आवेश उसकी बाहरी सतह पर विद्यमान रहता है। 

(ii) किसी चालक से वायु में वैद्युत विसर्जन, उसके नुकीले सिरों की प्राथमिकता से होता है।

इस जनित्र की कार्यविधि वैद्युत चालक के नुकीले सिरों (pointed ends) की क्रिया पर आधारित है।

  • चालक के नुकीले भाग पर आवेश का पृष्ठ घनत्व बहुत अधिक होने के कारण, इस भाग के पास तीव्र वैद्युत क्षेत्र उपस्थित होता है, जिससे वहाँ भी वायु का आयनीकरण (ionisation) हो जाता है।
  • तब विपरीत प्रकृति का आवेश आकर्षण के कारण नुकीले भाग के पास तथा समान प्रकृति का आवेश प्रतिकर्षण के कारण नुकीले भाग से दूर की ओर दौड़ता है अर्थात् नुकीले भाग से वैद्युत पवन उत्पन्न हो जाता है।
  • यदि किसी खोखले चालक गोले के अन्दर जुड़े किसी चालक के (नुकीले भाग के) पास कोई आवेश लाया जाए, तो यह सम्पूर्ण आवेश खोखले चालक के बाहरी पृष्ठ पर स्थानान्तरित हो जाता है, चाहे खोखले चालक को विभव कितना भी अधिक हो।
  • इस प्रकार खोखले चालक पर बार-बार आवेश देकर इसके आवेश तथा विभव को बहुत अधिक मान तक बढ़ाया जा सकता है। इसकी सीमा वैद्युतरोधी कठिनाइयों द्वारा निर्धारित की जाती है। 

रचना(construction)- 

चित्र में वानडे ग्राफ जनित्र की रचना प्रदर्शित है। इसमें लगभग 5 मीटर व्यास के धातु का खोखला गोला S होता है जो लगभग 15 मीटर ऊँचे विद्युतरोधी स्तम्भों A व B पर टिका रहता है। Pऔर P2 दो घिरनियाँ होती हैं जिनमें से होकर विद्युतरोधी पदार्थ; जैसे-रबर या रेशम की बनी एक पट्टी (belt) गुजरती है। नीचे की घिरनी P को एक वैद्युत मोटर के द्वारा घुमाया जाता है जिससे पट्टी ऊध्र्वाधर तल में तीर की दिशा में घूमने लगती है। C1 और C2 धातु की दो कंघियाँ होती हैं। C1 को फुहार कंघी (spray comb) तथा C2 को संग्राहक कंघी (collection comb) कहते हैं। कंघी C1 को एक उच्च विभव की बैटरी के धने सिरे से जोड़ दिया जाता है ताकि वह लगभग 10000 वोल्ट के पृथ्वी धनात्मक विभवे पर रह सके। कंघी C2 को गोले S के हैं आन्तरिक पृष्ठ से जोड़ दिया जाता है। D एक विसर्जन-नलिका (discharge tube) है। चित्र  गोले से आवेश के क्षरण (leakage) को रोकने के लिए जनित्र को एक लोहे के टैंक में जिसमें दाब । युक्त (लगभग 15 वायुमण्डलीय दाब) वायु भरी होती है, बन्द कर देते हैं। लोहे का टैंक पृथ्वीकृत होता है। 

कार्यविधि(Working)- 

जब कंघे C1 को अति उच्च विभव दिया जाता है, तो तीक्ष्ण बिन्दुओं की क्रिया के फलस्वरूप यह इसके स्थान में आयन उत्पन्न करता है। धन आयनों व कंघे C1 के बीच प्रतिकर्षण के कारण ये धन आयन बेल्ट पर चले जाते हैं। गतिमान बेल्ट द्वारा ये आयन ऊपर ले जाए जाते हैं। C2 के तीक्ष्ण सिरे बेल्ट को ठीक छूते हैं। इस प्रकार कंघा C2 बेल्ट के धन आवेश को एकत्रित करता है। यह धन आवेश शीघ्र ही गोले S के बाहरी पृष्ठ पर स्थानान्तरित हो जाता है। चूंकि बेल्ट घूमती रहती है, यह धन आवेश को ऊपर की ओर ले जाती है जो कंघे C2 द्वारा एकत्रित कर लिया जाता है तथा गोले S के बाहरी पृष्ठ पर स्थानान्तरित हो जाता है। इस प्रकार गोले S का बाहरी पृष्ठ निरन्तर धन आवेश प्राप्त करता है तथा इसका विभवे अति उच्च हो जाती है। जब गोले S का विभवे बहुत अधिक हो जाता है, तो निकटवर्ती वायु की परावैद्युत तीव्रता (dielectric strength) टूट जाती है तथा आवेश का निकटवर्ती वायु में क्षरण (leakage) हो जाता है। अधिकतम विभव की स्थिति में आवेश के क्षरण होने की दर गोले पर स्थानान्तरित आवेश की दर के बराबर हो। जाती है। गोले से आवेश का क्षरण रोकने के लिए, जनित्र को पृथ्वी से सम्बन्धित तथा उच्च दाबे पर वायू भरे टैंक में रखा जाता है।

वास्तविक जनित्र में एक खोखले गोले S के स्थान पर दो खोखले गोले प्रयुक्त करके, एक गोले पर धनावेश तथा दूसरे गोले पर ऋणावेश एकत्रित करके, इन दोनों गोलों के बीच एक अत्यन्त उच्च विभवान्तर प्राप्त कर लिया जाता है। वानडे ग्राफ जनित्र धन आवेशित कणों को अति उच्च वेग तक त्वरित करने के लिए प्रयोग किया जाता है। इस प्रकार का जनित्र IIT कानपुर में लगा है जो आवेशित कणों को 2 Mev ऊर्जा तक त्वरित कर सकता है।

उपयोग(Uses)- 

वानडे ग्राफ जनित्र के उपयोग निम्नलिखित हैं 

1. उच्च विभवान्तर उत्पन्न करने के लिए, 

2. तीव्र एक्स किरणों के उत्पादन में, 

3. नाभिकीय विघटन के प्रयोगों में आवेशित कणों (प्रोटॉन, ड्यूट्रॉन तथा α कण आदि) को उच्च गतिज ऊर्जा प्रदान करने में, 

4. नाभिकीय भौतिकी के अध्ययन में इसका उपयोग कण त्वरक (particle accelerator) के रूप में किया जाता है। 

दोष(Disadvantages)- 

वानडे ग्राफ जनित्र के दोष निम्नवत् हैं- 

1. इसके आकार के बड़ा होने के कारण इसका उपयोग असुविधाजनक होता है। 

2. उच्च विभव के कारण इसको उपयोग खतरनाक होता है।

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